21 दिसंबर से 27 दिसंबर का सप्ताह बलिदानी सप्ताह के तौर पर मनाया जाता है। ये उन 4 साहिबजादों की याद में समर्पित है, जिन्होंने सिख और हिंदू धर्म की रक्षा के लिए अपनी कुर्बानी दी। लेकिन बर्बर मुगलों के सामने नहीं झुके और न ही धर्म परिवर्तन किया। ये सप्ताह सिखों के दशम् गुरू गोबिंद सिंह के पुत्रों साहिबजादा अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह व फतेह सिंह को समर्पित है। जिनके लिए चार साहिबजादे शब्द का प्रयोग सामूहिक रूप से संबोधित करने हेतु किया जाता है।
बलिदान दिया लेकिन मुगल आक्रांताओं के सामने नहीं झुके
भारत माता की रत्नगर्भा माटी से महापुरुष व वीर योद्धा जन्म लेते हैं। जिन्होंने अपने व्यक्तित्व और कर्तृव्य से न सिर्फ स्वयं को प्रतिष्ठित किया, बल्कि उनके अवतरण से सम्रग विश्व मानवता धन्य हुई है। इन्हीं संत-पुरुषों, गुरूओं एवं महामनीषियों की शृंखला में एक महापुरुष हैं- गुरू गोबिंद सिंह जी। जिनकी दुनिया के महान तपस्वी, महान कवि, महान योद्धा, महान संत आदि के रूप में पहचान है। गुरू गोबिंद सिंह जी ने युद्ध को धर्म से समन्वित किया था और मुगलों की सेना से भिड़ने को त्याग, तपस्या, साधना, संगठन व अस्त्र-शस्त्र सभी क्षेत्रों में सिक्खों के आत्मबल को जगाया। उनके दो पुत्र अजीत सिंह और जुझार सिंह मुगलों से लोहा लेते हुए बलिदान हुए। दो पुत्रों जोरावर सिंह व फतेह सिंह को सरहिंद के सूबेदार वजीर खान ने इस्लाम स्वीकार न करने पर दीवार में जिन्दा चिनवा दिया था। गुरु गोविन्द सिंह का बलिदान सर्वोपरि और अद्वितीय है। क्योंकि गुरूजी ने धर्म के लिए अपने पिता गुरु तेगबहादुर और अपने चार पुत्र अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फतह सिंह को बलिदान कर दिया था।चार-चार पुत्रों को खोकर भी गुरू गोबिंद सिंह जी ने वीरता और त्याग का परिचय देते हुए यही कहा कि…‘‘चार मरे तो क्या हुआ, जीवित कई हजार।’’
मुना के किनारे बसे पहाड़ी राज्य सिरमौर के पांवटा नामक गाँव में दशमेश गुरु गोविन्द सिंह ने कृष्णावतार जैसा वृहत ग्रन्थ लिखा था। उसके समापन पर उनका लिखा संकल्प पढ़ने योग्य है –
दशम कथा भागौत की,
भाखा करी बनाय,
अवन वासना नहीं,
प्रभु धरम जुद्ध की चाह।
लोकभाषा में भागवत कथा लिख दी है, हे प्रभु अब कोई इच्छा शेष नहीं है, बस धर्मयुद्ध की चाह है। और उनका जीवन दर्शाता है कि उन्होंने अपने इस संकल्प को ही जीवन-व्रत बनाकर निभाया।
गढ़वाल के राजा फतह शाह ने गुरू गोबिंदसिंह जी पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में उनका प्रमुख सेनापति संगो शाह, पहाड़ी राज्य के सेनानायक नजाबत खान को मारकर स्वयं भी शहीद हुआ। लेकिन अंततः गुरू गोबिंद सिंह जी द्वारागढ़वाल के राजा फतह शाह ने गुरू गोबिंदसिंह जी पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में उनका प्रमुख सेनापति संगो शाह, पहाड़ी राज्य के सेनानायक नजाबत खान को मारकर स्वयं भी शहीद हुआ। लेकिन अंततः गुरू गोबिंद सिंह जी द्वारा की गई वाणवर्षा से आक्रमणकारी सेना पराजित होकर भाग खड़ी हुई। यह गुरू गोबिंद सिंह जी का प्रथम युद्ध था। इसके बाद गुरूजी आनंदपुर लौटे और सावधानी वश चार किलों का निर्माण करवाया- लोहगढ़, आनंद गढ़, केश गढ़ और फतेहगढ़।
भंगाणी के युद्ध का सुपरिणाम भी निकला और पहाड़ी राजाओं ने सिखों की शक्ति को पहचान कर एक दूसरे से न लड़ने और मुगलों का मुकाबला संयुक्त रूप से करने की संधि कर ली। इतना ही नहीं तो इन राजाओं ने मुगल सल्तनत को कर देना भी बंद कर दिया। और फिर वह समय भी आया, जब मियाँ खाँ, अलिफ खाँ और जुल्फिकार खाँ के नेतृत्व में आई मुगल सेना को इस संगठित शक्ति से नादौन युद्ध में पराजित होना पड़ा।
किन्तु जैसा होता आया है, जब हुसैन खान नामक एक सेना नायक विशाल सैन्य दल के साथ आया, तो यह एकता छिन्न भिन्न हो गई और गढ़वाल का राजा मधुकर शाह पराजित हुआ, और कहिलूर का राजा भीमचंद और कटोच का राजा कृपालचंद नजराना लेकर हुसैन खान से जा मिला। किन्तु इसके बाद भी गुलेर के राजा गोपाल चंद और सिक्खों ने मिलकर हुसैन खान को धूल चटा दी। हुसैन खान भी मारा गया।
अब औरंगजेब को गुरू गोबिंदसिंह खतरा लगने लगे। वह स्वयं तो दक्षिण में व्यस्त था, अतः उसने अपने बड़े बेटे मुअज्जम को सेना लेकर भेजा। यही मुअज्जम आगे चलकर बहादुर शाह के नाम से औरंगजेब का उत्तराधिकारी बना। मुअज्जम स्वयं तो लाहौर में रुक गया, किन्तु अपने सेनापति मिर्जा बेग को उपद्रवग्रस्त क्षेत्रों में भेजा। इस सेना ने गाँव के गाँव धूल में मिला दिए, पहाड़ी राजाओं को बुरी तरह कुचल दिया गया, किन्तु आनंदपुर फिर भी सुरक्षित रहा।
उसके बाद आया 30 मार्च सन् 1699 का वह ऐतिहासिक दिन जब बैसाखी के अवसर पर आनंदपुर में सिक्ख गुरूओं का विशाल शिष्य वर्ग एकत्रित हुआ। सम्पूर्ण भारत के ही नहीं, अफगानिस्तान और ईरान तक से शिष्य वहाँ पहुँचे थे। गुरू गोबिंदसिंह जानते थे कि आज भले ही शहजादा मुअज्जम बिना उनसे लड़े वापस हो गया हो, किन्तु देरसबेर मुगल सत्ता से संघर्ष निश्चित है। कुछ समय के लिए साथ आए पहाड़ी राजा, हारने के बाद एक बार फिर बादशाह की शरण में पहुँच गए थे। अतः अब तो आध्यात्मिक चेतना से युक्त समाज में बलिदानी तेवर पैदा करना ही एकमात्र उपाय हो सकता है। अतः उनकी दृष्टि अब समाज के आम व्यक्ति पर थी। वैसाखी के उस पवित्र अवसर पर हजारों शिष्यों के सम्मुख हाथ में नंगी तलवार लेकर जब उन्होंने सीधा सवाल किया- है कोई ऐसा जो आज इसी क्षण धर्म के लिए अपने प्राण दे सके?
यह सुनते ही सन्नाटा छा गया। उन्होंने दूसरी बार अपनी बात दोहराई, तो मानो लोगों की साँसें भी थम गई, कोई सुई भी गिरे तो उसकी आवाज बम जैसी प्रतीत हो ऐसा सन्नाटा। जब तीखी आवाज में उन्होंने तीसरी बार अपनी बात दोहराई- है कोई ऐसा जो धर्म के लिए अपने प्राण दे सके?
तो लाहौर के खत्री दयाराम ने अपने स्थान पर खड़े होकर कहा- महाराज, मैं प्रस्तुत हूँ।
वे उसे बगल के खेमे में ले गए। एक खटाक की तेज आवाज हुई, और कुछ क्षण बाद गुरूजी रक्त से सनी तलवार हाथ में लेकर बाहर आये और पुनः गंभीरता से पूछा- कोई और शिष्य है जो धर्म के लिए अपने आप को प्रस्तुत कर सके। इस बार हस्तिनापुर के एक जाट धर्मदास ने अपने आप को प्रस्तुत किया। वे उसे भी साथ के खेमे में ले गये। लोगों ने फिर उसी तरह खटाक की तेज आवाज सुनी। गुरूजी फिर उसी प्रकार रक्तरंजित तलवार लिए बाहर आये और फिर वही सवाल दोहराया। एक के बाद एक तीन और लोगों ने अपने आप को समर्पित किया। एक थे द्वारका के धोबी मोहकमचंद, दूसरे जगन्नाथ पुरी के कहार हिम्मत राय और तीसरे थे बीदर के एक नाई साहबचंद।
स्पष्ट ही यह एक परीक्षा थी, जिसमें देश के विभिन्न भागों से आये अतिशय साधारण ये पाँच व्यक्ति पूरी तरह सफल हुए। गुरूजी ने इन पाँचों आत्मोत्सर्गियों को सुन्दर वस्त्रों से सुसज्जित किया और इन्हें एक नया संबोधन दिया- पंज प्यारे। इन पंजप्यारों में सभी उन वर्गों से थे, जिन्हें समाज में शूद्र कहा जाता था। उन्होंने उस दिन जिस खालसा पंथ की नींव रखी, वह समझने योग्य है। उन्होंने सर्वप्रथम इन पाँचों को दीक्षा दी और फिर इन पाँचों से स्वयं को दीक्षित करवाया। उन्होंने खालसा को गुरू का स्थान दिया और गुरू को खालसा का। उस समय अमृतपान करने के बाद उन्होंने यही उद्घोष किया-
आपे गुरू आपे चेला,
गुरू खालसा, खालसा चेलास।।
अगले पंद्रह दिन में लगभग अस्सी हजार लोग इस नए मार्ग पर चलने को सन्नद्ध हुए और उन्होंने दीक्षा ली। गुरू जी ने आदेश दिया कि आज के बाद सभी खालसा अपने नाम के आगे सिंह शब्द लगायेंगे। इस प्रकार गुरूजी ने देखते ही देखते अपने विनीत शिष्यों को शेर बना दिया। गुरू गोबिंद सिंह ने सिखों में यह विश्वास उत्पन्न किया कि वे लोग ईश्वरीय कार्य करने हेतु उत्पन्न हुए हैं। उन्होंने यही उद्घोष करने को नया नारा दिया-
वाहे गुरू जी दा खालसा। वाहे गुरू जी दी फतह।।
अर्थात् खालसा ईश्वर का है और ईश्वर की विजय सुनिश्चित है। समाज के तथाकथित उच्च वर्ग में खालसा निर्माण की तीखी प्रतिक्रिया हुई। और उसका पहाड़ी राजाओं के व्यवहार के रूप में सीधा प्रकटीकरण हुआ। इन पाँच राजाओं ने सन् 1700 में दो मुगल सरदारों पेंदे खान और दीना बेग की मदद से आनंदपुर पर धावा बोल दिया। इस युद्ध में गुरूजी के बड़े बेटे अजीत सिंह ने अपार पराक्रम प्रदर्शित किया। फतहगढ़ के दुर्ग रक्षक उदयसिंह के हाथों जगातुल्लाह नामक मुगल सरदार मारा गया। आनंदपुर का मुख्य द्वार तोड़ने आए मदमस्त हाथी को विचित्र सिंह ने महज बरछी के प्रहारों से इतना विचलित कर दिया कि उसने अपनी ही सेना को रोंद डाला। गुरू गोबिंदसिंह के हाथों मुगल सरदार पैंदे खान मारा गया, तो उदय सिंह ने राजा केसरीचंद का सर काट लिया। दीना बेग घायल होकर भाग खड़ा हुआ। मात्र बीस हजार खालसा वीरों ने अस्सी हजार के संख्याबल को करारी शिकस्त दी। पहाड़ी राजा और मुगल सेना इसी प्रकार बार बार आती रही और हारती रही।
किन्तु 1703 मध्य में स्थिति विषम हो गई, जब विशाल मुगल सेना ने आनंदपुर को घेर लिया। घेरा आठ महीने तक डला रहा। दुर्ग में खाने पीने की भारी किल्लत हो गई। स्थिति यह बनी कि चार सिक्ख योद्धा किले से बाहर निकलते, दो युद्ध करते और दो किसी प्रकार थोड़ा बहुत पानी अन्दर ले जाते। इनमें से कभी दो मरते तो कभी तीन तो कभी चारों। मुगल सेनानायक बार बार गीता और कुरआन की सौगंध खाकर सन्देश भेजते रहे कि आप तो किला छोड़कर निकल जाओ, हम कुछ नहीं करेंगे। हमें तो केवल किला चाहिए। अंत में साथियों के लगातार आग्रह के बाद 21 दिसंबर 1704 को गुरू गोबिंदसिंह जी ने अपनी बची हुई सेना और परिवार के साथ दुर्ग छोड़ा।
अभी वे सरसा नदी के तट पर ही पहुँचे थे कि तभी अपनी सभी सौगंधों को तोड़कर शत्रु सेना आ गई। कुछ सिक्खों ने नदी किनारे मुगल सेना को रोका और गुरूजी अपने चालीस सैनिकों और दो पुत्रों उन्नीस वर्षीय अजीत सिंह और 14 वर्षीय जुझार सिंह के साथ चमकौर गढ़ी तक पहुँच गए। किन्तु दो छोटे बेटे जोरावर सिंह और फतह सिंह अपनी दादी माता गूजरी के साथ इनसे बिछुड़ गए। इन तीनों को रसोईया गंगाराम ( गंगू ) अपने साथ अपने गाँव ले गया। किन्तु बाद में उसकी नीयत खराब हो गई और धन के लालच में उसने तीनों को सरहिंद के सूबेदार वजीर खान को सौंप दिया।
वजीर खाँ द्वारा प्रताड़ना
खबर मिलते ही वजीर खाँ के सैनिक माता गुजरी और साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह को गिरफ्तार करने गंगू के घर पहुँच गए। उन्हें लाकर ठंडे बुर्ज में रखा गया और उस ठिठुरती ठंड से बचने के लिए कपड़े का एक टुकड़ा तक ना दिया।
रात भर ठंड में ठिठुरने के बाद सुबह होते ही दोनों साहिबजादों को वजीर खाँ के सामने पेश किया गया, जहाँ भरी सभा में उन्हें इस्लाम धर्म कबूल करने को कहा गया। कहते हैं सभा में पहुँचते ही बिना किसी हिचकिचाहट के दोनों साहिबजादों ने जोर से जयकारा लगा ‘‘जो बोले सो निहाल, सत् श्री अकाल’’।
यह देख सब दंग रह गए, वजीर खाँ की मौजूदगी में कोई ऐसा करने की हिम्मत भी नहीं कर सकता लेकिन गुरु जी की नन्हीं जिंदगियाँ ऐसा करते समय एक पल के लिए भी ना डरीं।
साहिबजादा अजीत सिंह और जुझार सिंह की अप्रतिम वीरता
चमकौर गढ़ी भी शत्रु सेना द्वारा घेर ली गई। गुरू गोबिंद सिंह, उनके दोनों बड़े पुत्रों और चालीस साथियों ने बड़ी वीरता पूर्वक युद्ध किया, गुरू गोबिंद सिंह के तीरों की मार से मुगल सरदार नाहर खान मारा गया।
अजीत सिंह श्री गुरु गोबिन्द सिंह के सबसे बड़े पुत्र थे। चमकौर के युद्ध में अजीत सिंह अतुलनीय वीरता का प्रदर्शन करने को तत्पर हुए। गुरु जी द्वारा नियुक्त किए गए पाँच प्यारों ने अजीत सिंह को समझाने की कोशिश की कि वे ना जाएँ, क्योंकि वे ही सिख धर्म को आगे बढ़ाने वाली अगली शख्सियत हो सकते हैं लेकिन पुत्र की वीरता को देखते हुए गुरु जी ने अजीत सिंह को निराश ना किया।
गुरूजी ने स्वयं अपने हाथों से अजीत सिंह को युद्ध लड़ने के लिए तैयार किया, अपने हाथों से उन्हें शस्त्र दिए थमाए और पाँच सिखों के साथ उन्हें किले से बाहर रवाना किया। कहते हैं रणभूमि में जाते ही अजीत सिंह ने मुगल फौज को थर-थर कांपने पर मजबूर कर दिया। अजीत सिंह कुछ यूँ युद्ध कर रहे थे मानो कोई बुराई पर कहर बरसा रहा हो।
अजीत सिंह एक के बाद एक वार कर रहे थे, उनकी वीरता और साहस को देखते हुए मुगल फौज पीछे भाग रही थी लेकिन वह समय आ गया था जब अजीत सिंह के तीर खत्म हो रहे थे। जैसे ही दुश्मनों को यह अंदाजा हुआ कि अजीत सिंह के तीर खत्म हो रहे हैं, उन्होंने साहिबजादे को घेरना आरंभ कर दिया।
लेकिन तभी अजीत सिंह ने म्यान से तलवार निकाली और बहादुरी से मुगल फौज का सामना करना आरंभ कर दिया। कहते हैं तलवार बाजी में पूरी सिख फौज में भी अजीत सिंह को कोई चुनौती नहीं दे सकता था तो फिर ये मुगल फौज उन्हें कैसे रोक सकती थी। अजीत सिंह ने एक-एक करके मुगल सैनिकों का संहार किया। वे आखिरी सांस तक लड़ते रहे और फिर आखिरकार वह समय आया जब उन्होंने शहादत को अपनाया। अजीत सिंह से छोटे जुझार सिंह अपने बड़े भाई के बलिदान के पश्चात् नेतृत्व संभाला तथा पदचिन्हों पर चलते हुए मुगल सेना से घनघोर युद्ध कर अतुलनीय वीरता का प्रदर्शन करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
अंत में 22 दिसंबर को एक बहादुर शिष्य संगतसिंह गुरू जी के वस्त्र पहनकर वाण बरसाता रहा, शत्रु उसे ही गुरू गोबिंद सिंह समझते रहे, तब तक अपने बचे हुए साथियों के साथ गुरू गोबिंद सिंह सुरक्षित दुर्ग से निकल गए।
मुगलों का कहर और निडर साहिबजादों की शहादत
सबसे अनूठा बलिदान तो चमकौर में हुआ। सभा में मौजूद मुलाजिम ने साहिबजादों को वजीर खाँ के सामने सिर झुकाकर सलामी देने को कहा, लेकिन इस पर उन्होंने जो जवाब दिया वह सुनकर सबने चुप्पी साध ली।दोनों ने सिर ऊँचा करके जवाब दिया कि ‘हम अकाल पुरख और अपने गुरु पिता के अलावा किसी के भी सामने सिर नहीं झुकाते। ऐसा करके हम अपने दादा की कुर्बानी को बर्बाद नहीं होने देंगे, यदि हमने किसी के सामने सिर झुकाया तो हम अपने दादा को क्या जवाब देंगे, जिन्होंने धर्म के नाम पर सिर कलम करवाना सही समझा, लेकिन झुकना नहीं’।
वजीर खाँ ने दोनों साहिबजादों को काफी डराया, धमकाया और प्यार से भी इस्लाम कबूल करने के लिए राजी करना चाहा, लेकिन दोनों अपने निर्णय पर अटल थे।बच्चों द्वारा अस्वीकार करने पर 27 दिसंबर 1704 को उन्हें जिन्दा दीवार में चिनवाना शुरू कर दिया। कहते हैं दोनों साहिबजादों को जब दीवार में चुनना आरंभ किया गया तब उन्होंने ‘जपुजी साहिब’ का पाठ करना शुरू कर दिया। जिस समय छोटे भाई फतह सिंह की नाक तक दीवार पहुँची, बड़े भाई की आँखों में आंसू छलछला आये।
वजीर खान को लगा कि बड़ा जोरावर कमजोर पड़ रहा है, अतः उसने पूछा- अभी भी समय है, मान जाओ और इस्लाम कबूल कर लो तो जान बच जाएगी। यह सुनकर जोरावर की आँखों से आँसू की जगह शोले बरसने लगे। बोले- अरे हत्यारे, तू क्या यह समझ रहा है कि मैं मौत से डरकर आँसू बहा रहा हूँ। अरे दुष्ट ये आँसू तो इस दुःख के कारण आए हैं कि मेरा छोटा भाई मुझसे बाद में इस दुनिया में आया, किन्तु आज जब देश धर्म पर कुर्बान होने का अवसर आया तो यह मुझसे पहले कुर्बान हो रहा है।
बच्चों के बलिदान के बाद माता गूजरी ने भी बच्चों के शोक में प्राण त्याग दिए।
कहीं पर्वत झुके भी हैं, कही दरिया रुकी भी हैं।
नहीं झुकती जवानी है, नहीं रूकती रवानी है।।
गुरु गोविन्द के बच्चे, उम्र में थे अभी कच्चे।
मगर थे सिंह के बच्चे, धर्म ईमान के सच्चे।
गरज कर बोल उठे थे यों, सिंह मुख खोल उठे थे ज्यों।
नहीं हम झुक नहीं सकते, नहीं हम रुक नहीं सकते।
हमे निज देश प्यारा है, पिता दशमेश प्यारा है।
हमे निज धर्म प्यारा है, श्री गुरुग्रन्थ प्यारा है।।
नहीं झुकती जवानी है, नहीं रूकती रवानी है।
जोरावर जोर से बोला, फतेह सिंघ शोर से बोला।
रखो ईटें भरो गारे, चुनो दीवार हत्यारे।
निकलती श्वांस बोलेगी, हमारी लाश बोलेगी।
यही दीवार बोलेगी, हजारों बार बोलेगी।
हमारे देश की जय हो, पिता दशमेश की जय हो।
हमारे धर्म की जय हो, श्री गुरुग्रंथ की जय हो।।
कही पर्वत झुके भी हैं, कहीं दरिया रुकी भी हैं।
नहीं झुकती जवानी है, नहीं रूकती रवानी है।।
गुरु गोविंद गोविंद सिंह जैसा न कोई हुआ है और न कोई होगा
परोपकारी गुरु गोविंद सिंह जी में सबसे बड़ी बात यह थी कि वे अपने आपको औरों जैसा सामान्य व्यक्ति ही मानते थे। गुरु गोविंद सिंह जी के बारे में लिखना मुश्किल है, क्योंकि साहिब-ए-कलाम बादशाह दरवेश गुरु गोविंद सिंह जैसा न कोई हुआ और न कोई होगा।
पुत्र के रूप में:- आपके जीवन के बारे में लिखते समय यह समझ में नहीं आता है कि आपका जीवन किस पक्ष में लिखा जाए। अगर आपको एक पुत्र के रूप में देखा जाए तो आपके जैसा कोई पुत्र नहीं जिसने अपने पिता को हिंदू धर्म की रक्षा के लिए शहीद होने का आग्रह किया हो।
पिता के रूप में:- अगर आपको पिता के रूप में देखें तो भी आपके जैसा महान पिता कोई नहीं, जिन्होंने खुद अपने बेटों को शस्त्र दिए और कहा कि जाओ मैदान में दुश्मन का सामना करो और शहीदी जाम को पिओ।
लेखक के रूप में:- अगर आपको लेखक के रूप में देखा जाए तो आप धन्य हैं। आपका दसम ग्रंथ, आपकी भाषा, आपकी इतनी ऊंची सोच को समझ पाना आम बात नहीं है।
त्यागी के रूप में:- अगर एक त्यागी के रूप में आपको देखा जाए तो आपने आनंदपुर के सुख छोड़, मां की ममता, पिता का साया, बच्चों के मोह को आसानी से धर्म की रक्षा के लिए त्याग दिया।
योद्धा के रूप में:- अगर आपको एक योद्धा के रूप में देखें तो हैरानी होती है कि आपने अपने हर तीर पर एक तोला सोना लगवाया हुआ था। जब इस सोने का कारण आपसे सिखों ने पूछा कि मरते तो इससे दुश्मन होते है, फिर ये सोना क्यों? तो आपका उत्तर था कि मेरा कोई दुश्मन नहीं है। मेरी लड़ाई जालिम के जुल्म के खिलाफ है। इन तीरों से जो कोई घायल होंगे वो इस सोने की मदद से अपना इलाज करवा कर अच्छा जीवन व्यतीत करें और अगर उनकी मौत हो गई तो उनका अंतिम संस्कार हो सकें।
गुरु के रूप में:- आपके जैसा गुरु भी कोई नहीं जिसने अपने को सिखों के चरणों में बैठकर अमृत छका और वचन किया कि मैं आपका सेवक हूं जो हुकूम दोगे मंजूर करूंगा। समय आने पर आपने सिखों के हुकूम की पालना भी की।






