महात्मा बसवेश्वर वो संत थे जिन्होंने दक्षिण भारत में सर्वप्रथम जाति और वर्गरहित समाज का स्वप्न देखा। एक महान संत जिन्होंने 800 साल पहले नारी प्रताड़ना को खत्म करने की लड़ाई लड़ी। त्रिपुरारी शिव के परम उपासक संत जिन्होंने मठों, मंदिरों में फैली कुरीतियों, अंधविश्वासों और अमीरों की सत्ता को चुनौती दी। उनके नाम से कन्नड़ साहित्य का एक पूरा युग जाना जाता है। एक संत जो 12वीं सदी के कलचुरी साम्राज्य में ’प्रधानमंत्री’ भी बना। एक संत जो आज कर्नाटक में लिंगायत ही नहीं बल्कि सर्व समाज के प्रिय हैं। वैशाख शु. तृतीया (इस वर्ष 7 मई) संत बसवेश्वर की जयंती है।
संत बसवेश्वर का जन्म 1131 ईसवी में बागेवाडी (कर्नाटक के संयुक्त बीजापुर जिले में स्थित) में हुआ था। ब्राह्मण परिवार में जन्मे बसवेश्वर के पिता का नाम मादरस और माता का नाम मादलाम्बिके था। 8 साल की उम्र में बसवेश्वर का उपनयन संस्कार हुआ, लेकिन विद्रोही बालमन इस परंपरा में नहीं रम सका और उन्होंने उस धागे को तोड़कर, घर का भी त्याग कर दिया। बसवेश्वर यहां से कुदालसंगम (लिंगायतों का प्रमुख तीर्थ स्थल) पहुंचे, जहां उन्होंने सर्वांगीण शिक्षा हासिल की।
बाद के दिनों में संत बसवेश्वर कल्याण पहुंचे जहां उस समय कलचुरी साम्राज्य के शासक बिज्जाला का शासन (1157- 1167 ईसवी) था। बसवेश्वर के ज्ञान का सम्मान करते हुए कलचुरी साम्राज्य में उन्हें कण्णका (अकाउंटेंट) का पद दिया गया। बाद में वह अपने प्रशासकीय कौशल के बदौलत राजा बिज्जाला के प्रधानमंत्री बने। लेकिन बसवेश्वर को असल चिंता समाज की बिगड़ी हुई सामाजिक-आर्थिक दशा की थी। समाज में गरीब-अमीर की खाई लगातार चौड़ी हो रही थी। छुआछूत का व्यापक असर था। लैंगिक भेदभाव वाले समाज में महिलाओं का जीवन नारकीय बना हुआ था।
जयन्तीः वैशाख शुक्ल तृतीया – 7 मई
बसवेश्वर ने इन सभी बुराइयों के खिलाफ जंग छेड़ दी। समाजवादी विचारों के आरंभिक प्रणेता के रूप में बसवेश्वर एक महान सुधारक बनकर उभरे। उनके लेखन और दर्शन ने समाज में क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत की। उन्होंने अपने अनुभवों को एक गद्यात्मक-पद्यात्मक शैली में ‘वचन’ (कन्नड़ की एक साहित्यिक विधा) के रूप में लिखा। बसवेश्वर ने वीर शैव लिंगायत समाज बनाया, जिसमें सभी धर्म के प्राणियों को लिंग धारण कर एक करने की कोशिश की। बसवेश्वर ने सबसे पहले मंदिरों में व्याप्त भ्रष्टाचार और कुरीतियों को निशाना बनाया, जहां ईश्वर के नाम पर अमीर गरीबों का शोषण कर रहे थे। उनके महत्वपूर्ण कार्यों के लिए उनके युग को ‘बसवेश्वर युग’ का नाम दिया गया। बसवेश्वर को ‘भक्तिभंडारी बसवन्न’, ‘विश्वगुरु बसवण्ण’ और ‘जगज्योति बसवण्ण’ के नाम से भी जाना जाता है।
लगभग 900 सौ वर्षों के सुदीर्घ प्राकट्यकाल के बाद भी बसवेश्वर हमारे वैयक्तिक एवं सामाजिक जीवन के लिए बेहद प्रासंगिक एवं समीचीन लगते हैं। वे हमारे लोकजीवन के इर्द-गिर्द घूमते नजर आते हैं। बसवेश्वर मानवीय समाज के इतने बेबाक, साफ-सुथरे निश्छल मन के भक्त कवि हैं जो समाज को स्वर्ग और नर्क के मिथ्या भ्रम से बाहर निकालते हैं। वे हिन्दू समाज में व्याप्त पाखण्ड और कर्मकाण्ड को साफ शब्दों में दुत्कारते हैं। बसवेश्वर आज भी दहकते अंगारे हैं, कानन-कुसुम भी हैं बसवेश्वर जिनकी भीनी-भीनी गंध और सुवास नैसर्गिक रूप से मानवीय अरण्य को सुवासित कर रही है। हिमालय से उतरी हुई गंगा की पावनता भी है बसवेश्वर।
तरुण शर्मा











