एक बार महावीर स्वामी घनघोर वन से गुजर रहे थे। वे श्वेताम्बी नगरी जा रहे थे जिसका रास्ता एक घने जंगल से होकर गुजरता था। इस वन में चंडकौशिक नाम का एक भयंकर साँप रहता था। चंडकौशिक के बारे में कहा जाता था कि वह इतना जहरीला था कि उसके देखने मात्र से प्राणियों की जान चली जाती थी।
भगवान महावीर जब उस जंगल में प्रवेश कर रहे थे तो ग्रामीणों ने उनको उस सर्प के बारे में बताया और आने वाले खतरे से आगाह किया, लेकिन महावीर स्वामी के लिए तो प्राणीमात्र समान थे उनके पास भय नाम की कोई चीज नहीं थी इसलिए वो निर्भय होकर वन की ओर अग्रसर हो गए। कुछ दूरी तय करने के बाद जंगल की हरियाली गायब हो गई और बंजर भूमि नजर आने लगी। इस जगह पर जीवन का नामोनिशान नहीं था।
महावीर स्वामी को यह समझने में देर नहीं लगी कि वह सर्प चंडकौशिक के क्षेत्र में प्रवेश कर चुके हैं। भगवान महावीर ने वहीं पर ध्यान लगाने का निश्चय कर लिया। महावीर स्वामी के आने का संकेत मिलते ही चंडकौशिक तुरंत सतर्क हो गया और अपने बिल से बाहर निकलकर महावीर स्वामी के नजदीक पहुँच गया। साँप चंडकौशिक उनको देखकर गुस्से से लाल हो गया और सोचने लगा कि इस इंसान की यहाँ पर आने की हिम्मत कैसे हुई।
चंडकौशिक महावीर स्वामी की ओर फन फैलाकर फुफकारने लगा, लेकिन भयहीन महावीर स्वामी ध्यानमग्न थे इसलिए जरा भी भयभीत नहीं हुए। यह देखकर वह और ज्यादा क्रोधित हुआ और महावीर स्वामी को डराने के लिए और तेजी से फुफकारने लगा। अब चंडकौशिक ने अपना जहर महावीर स्वामी के ऊपर उड़ेल दिया। इस विष का भी उनके ऊपर कोई असर नहीं हुआ। जब चंडकौशिक ने देखा की विष उड़ेलने का भी उनके ऊपर कोई असर नहीं हुआ तो उसने महावीर स्वामी के अँगूठें में डस लिया।
अब चंडकौशिक के आश्चर्य का ठिकाना नहीं था क्योंकि उनके अँगूठे से खून की जगह दूध बह रहा था। कुछ देर बाद जब महावीर स्वामी ने आँखें खोली तो वे भयहीन और शांतचित्त थे। भगवान महावीर ने उसको प्रेमपूर्वक अहिंसा का उपदेश दिया तो चंडकौशिक के मन-मस्तिष्क से अभिमान और क्रोध के भाव गायब थे। उसने प्रेम और अहिंसा का आवरण ओढ़ लिया था।
सारः प्रेम और अहिंसा से आत्म संयम और भावनाओं पर नियंत्रण उत्पन्न होता है। जिससे कठोर से कठोर प्राणी का भी हृदय परिवर्तन हो जाता है।
ख्याति पालीवाल











