भारत के प्राचीन ऋषि मनीषियों ने लम्बी साधना एवं गहन अध्ययन के द्वारा शरीर को स्वस्थ एवं दीर्घायु रखने के लिये विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों को विकसित किया। उनमें से ‘‘मुद्रा विज्ञान’’ एक ऐसी चिकित्सा पद्धति है जिसमें हाथों की अँगुलियों व अँगूठे के उपयोग के द्वारा ही चिकित्सा का लाभ प्राप्त किया जा सकता है। चिकित्सा पद्धति में हठ योग के आसन, प्राणायाम एवं बंध की कुछ जानकारी अधिकांश लोगों को है परन्तु मुद्राओं की जानकारी एवं उनके अद्भुत प्रभाव से अधिकांश जन अपरिचित हैं। आइए, कुछ मुद्राएँ और उनके प्रभाव से परिचित होते हैं –
विधि: हाथ की सबसे छोटी अंगुली को कनिष्ठा कहते हैं। इसके अग्रभाग से अँगूठे के अग्र भाग को मिला दिया जाये और शेष तीनों अंगुलियाँ सीधी रहें तो इन्द्र मुद्रा बन जाती है।
अवधिः दिन में तीन बार 15-15 मिनट नित्य करें।
सावधानीः यदि आपको ठण्ड लग रही है, सर्दी जुकाम है, नाक व आँखों से पानी आ रहा हो, कफ है, साईनस में श्लेष्मा जमा हो गया है तो इस मुद्रा को न करें।
लाभ:
- इस मुद्रा का उद्देश्य है शरीर में जल तथा अन्य तत्वों का संतुलन बनाये रखना। इस मुद्रा के सामान्य प्रयोग से त्वचा कोमल, मुलायम व चिकनी बनी रहती है। चेहरे पर झुर्रियाँ नहीं पड़ती हैं, यौवन लम्बे समय तक बना रहता है। यह मुद्रा किसी सौन्दर्य प्रसाधन से कम नहीं है।
- इस मुद्रा से त्वचा रोग ठीक होते हैं। जैसे दाद, खुजली, एग्जिमा, सोरायसिस आदि। सर्दियों में शुष्क व ठंडी हवाओं से त्वचा सूख जाती है। इस कारण बिना त्वचा रोग के भी खुजली चलती है। इस मुद्रा से उसमें भी लाभ होता है।
- गर्मी के मौसम में प्रायः अतिसार, डायरिया, पतले दस्त हो जाते हैं। दो चार दस्त आने से ही हमें कमजोरी आ जाती है। शरीर में पानी की कमी के कारण ऐसा होता है। इसे ही डीहाईड्रेशन कहते हैं। ऐसी स्थिति में चिकित्सक ओ.आर.एस. या पानी, नमक व शक्कर का घोल बार-बार पीने की सलाह देते हैं। ऐसी समस्या होने पर इस मुद्रा को करने से चमत्कारी लाभ होता है। हर बार शौच जाने के बाद इस मुद्रा को करने से जल तत्व की कमी नहीं होती, शरीर में कमजोरी नहीं आती है।
- मूत्र रोगों एवं गुर्दे के रोगों में जब बार-बार लघुशंका के लिए जाना पड़ता है तो इस मुद्रा को लगाने से लाभ होता है।
- मधुमेह के रोग में भी लघुशंका ;न्तपदमद्ध अधिक आती है, रात को कई बार उठना पड़ता है। इस मुद्रा को करने से इसमें भी राहत मिलती है।
- तेज बुखार में मुँह का स्वाद बिगड़ जाता है। होठ सूखने लगते हैं, कई बार होठ फट भी जाते हैं। ऐसी स्थिति में यह मुद्रा लगाने से लाभ होता है।
- यदि आँखों में जलन होती हो, सूखापन अनुभव हो तो यह मुद्रा लगाएं।
- अपने रक्त का 80 प्रतिशत भाग जल ही है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह एवं काॅलेस्ट्रोल बढ़ जाने के कारण जब रक्त गाढ़ा हो जाता है, रक्त को सामान्य करने के लिए इस मुद्रा का प्रयोग करें। इससे रक्त संचार ठीक रहेगा, रक्त के रोग नहीं होंगे। रक्त द्वारा पूरे शरीर में ऑक्सीजन और प्राणों का संचार ठीक प्रकार से होता रहेगा।
- ग्रीष्म ऋतु में इस मुद्रा को लगाने से हम अधिक प्यास से बच सकते हैं, लू नहीं लगती, शीतलता भी रहती है।
- पेट में वायु की समस्या में भी यह मुद्रा उपयोगी सिद्ध होती है।
- शरीर में जल की कमी से अकड़न आ जाती है। उनमें ऐंठन एवं तनाव उत्पन्न होता हैं। यह मुद्रा मांसपेशियों को शिथिल करते हुए हमें ऐसी स्थिति से बचाती है।
- फोड़े, फुंसियों, कील, मुहासों में भी यह मुद्रा लाभदायक है। अम्लपित्त के बढ़ जाने से होने वाले रोग भी शांत हो जाते है।
श्रीवर्धन











