श्रीकृष्ण के विलक्षण व्यक्ति त्व का एक पक्ष यह भी है जहाँ उन्होंने दुष्टों के संहार के लिए हाथ में सुदर्शन चक्र लिया, वहीं माधुर्य और प्रीति की रस वर्षा के लिए अधरों पर बाँसुरी रखी। एक ओर शौर्य का प्रतीक सुदर्शन चक्र और दूसरी और हृदय को मुग्ध करने वाली बाँसुरी। श्री कृष्ण के व्यक्ति त्व में सुदर्शन चक्र और बाँसुरी का अद्भुत समन्वय हुआ है। वे काव्य, संगीत, नृत्य, अभिनय, चित्रकला आदि ललित कलाओं के भी प्रणेता हैं।
योगेश्वर श्रीकृष्ण भारतवर्ष की महानतम् विभूतियों में से एक थे। उनका जीवन समस्त मनुष्यमात्र के लिए प्रेरणास्रोत है। जहाँ पौराणिक बन्धु उन्हें भगवान मानते हैं, वहीं वैदिकधर्मी उन्हें महापुरुष मानते हैं और उनके उज्ज्वल चरित्र से अपने गुण कर्म स्वभाव सुधारना ही उनकी वास्तविक पूजा मानते हैं।
समाज में अवतारवाद की भावना के फलस्वरूप राम और कृष्ण दोनों के ही रूपों का पूजन किया गया। दोनों को ही पूर्ण ब्रह्म का प्रतीक मानकर, आदर्श मानव के रूप में प्रस्तुत किया गया किंतु जहाँ राम मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में सामने आते हैं, वही कृष्ण एक सामान्य परिवार में जन्म लेकर सामंती अत्याचारों का विरोध करते हैं।
भारतीय संस्कृति में कृष्ण एक विलक्षण और अद्वितीय व्यक्तित्व वाले पुरुष हैं। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसकी तुलना न किसी अवतार से की जा सकती है और न संसार के किसी महापुरुष से। श्री कृष्ण के जीवन की प्रत्येक लीला में, प्रत्येक घटना में एक ऐसा विरोधाभास दिखता है, जो साधारणतः समझ में नहीं आता है और यही विलक्षणता है उनके जीवन चरित्र की या संभवतः जीवन दर्शन की भी। ज्ञानी-ध्यानी जिन्हें खोजते हुए हार जाते हैं, जो न ब्रह्म में मिलते हैं, न पुराणों में और न वेद की ऋचाओं में, वे मिलते हैं ब्रजभूमि की किसी कुंज-निकुंज में गोप बाल-बालाओं संग लीला रचाते हुए। श्रीकृष्ण सदाचार की मूर्ति थे। वे मन की पवित्रता के पोषक थे।
यह कृष्ण के चरित्र की विलक्षणता ही तो है कि वे अजन्मा होकर भी पृथ्वी पर जन्म लेते हैं। मृत्युंजय होने पर भी मृत्यु का वरण करते हैं। वे सर्व शक्तिमान होने पर भी जन्म लेते हैं कंस के बन्दीगृह में। उनके पिता हैं वसुदेव और माता देवकी, किन्तु नन्दबाबा और यशोदा द्वारा पालन किए जाने के कारण उनके पुत्र कहलाए जाते हैं। समस्त सृष्टि को बंधन में रखने की क्षमता रखने पर भी खल से बंध जाते हैं। द्वारकाधीश होने पर भी श्रीकृष्ण अपने निर्धन मित्र सुदामा को नहीं भूलते। अश्रुपूरित नेत्रों से वे सुदामा का आलिंगन करते हैं। मिलन के समय सुदामा को उसी समय कुछ देकर अपनी संपन्नता या बड़प्पन नहीं जताते, उन्हें उनका छोटा या गरीब होना नहीं महसूस कराते, बस मित्र को अपने बराबर ही रहने देते हैं। लेकिन सुदामा के अपने घर पहुँचने से पूर्व ही उन्हें अतुल वैभव प्रदान करने से नहीं चूकते।
उन्होंने कंस का वध ब्रजवासियों को उसके अत्याचारों और अनाचारों से मुक्ति दिलाने के लिए किया, न कि सत्ता प्राप्ति के लिए। इसीलिए कंस का संहार करके भी उन्होंने कंस के पिता उग्रसेन को ही राज सिंहासन पर बैठाया, जबकि वे सरलता से स्वयं राजा बन सकते थे। गीता के रूप में उन्होंने जो उपदेश दिए, उसने उन्हें योगिराज की महत्ता प्रदान की। श्री कृष्ण एक ओर रसराज हैं, रासेश्वर हैं, रसिक बिहारी हैं और दूसरी ओर योगेश्वर तथा योगिराज हैं। इन दो परस्पर विरोधी गुणों का समन्वय उस विलक्षण व्यक्तित्व में हुआ है, जिसे रस-योगी के रूप में सम्बोधित किया जा सकता है।
श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व एवं कृतित्व प्रेरक, आकर्षक, लोकोपकारक, बहुआयामी तथा चुम्बकीय था। इसी कारण लाखों हजारों वर्षों के घात-प्रतिघात, वात्याचक्रों विवादों आदि के होते हुए भी वे आज भी जनमानस के हृदयों में पूजित सम्माननीय, स्मरणीय व अलौकिक महापुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हैं। श्रीकृष्ण पुण्यात्मा, धर्मात्मा, तपस्वी, त्यागी, योगी, वेदज्ञ, निरहंकारी, कूटनीतिज्ञ, लोकोपकारक, खण्ड- खण्ड भारत को अखण्ड देखने के स्वप्नद्रष्टा आदि अनेक गुणों व विशेषणों से विभूषित थे। वे मानवता के रक्षक, पालक और उद्धारक थे। उनके जीवन का उद्देश्य था- ‘परित्राणाय साधूनाम्’, सत्पुरुषों व धर्मात्माओं की रक्षा हो तथा ‘विनाशाय च दुष्कृताम्’ पापी, अपराधी तथा दुष्ट प्रकृति के लोगों का दलन हो और ‘धर्म संस्थापना’ अर्थात् सत्य धर्म, न्याय की सर्वत्र स्थापना होनी चाहिए। इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति में उन्होंने दुःख, कष्ट, विरोध एवं संघर्ष करते हुए सारा जीवन लगा दिया।
पौराणिक एवं धार्मिक क्षेत्र में श्रीकृष्ण की अवतार के रूप में मान्यता है, किन्तु भगवान के रूप में कृष्ण जन-जन के जितना निकट हैं, उतना कोई भी दूसरा अवतार नहीं है। ब्रज के ग्वाल-बाल के साथ उनका सखा भाव है, तो ब्रज-गोपिकाओं के साथ अनन्य प्रीति। श्रीकृष्ण का चरित्र एक लोकनायक का चरित्र है। वे माखन-चोर हैं, गोपाल हैं, गोपी-वल्लभ हैं और द्वारकाधीश भी हैं। किन्तु कभी उन्हें राजा राम की भांति ‘राजा कृष्ण’ के रूप में सम्बोधित नहीं किया जाता है।
श्रीकृष्ण को उनके अन्यान्य अद्भुत गुणों ने ही जाति, सम्प्रदाय, भाषा और संस्कृति से बहुत ऊपर उठाकर न केवल भारतीय संस्कृति का अपितु विश्व संस्कृति का प्रिय चरित्र बना दिया। इसीलिए कृष्ण की भक्ति की अनेक धाराएँ लोक जीवन से निकलीं, अनेक संप्रदाय बने। यहाँ तक कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उन भक्ति संप्रदायों का फैलाव हुआ। इसकी सबसे बड़ी वजह शायद उनके व्यक्तित्व का बहुरंगी होना है। उसमें विविधता है, गति है- श्रीकृष्ण कोई जड़ चरित्र नहीं है। कृष्ण के व्यक्तित्व से विविधता, सर्वप्रियता, सखाभाव और दो अतिरेकों के बीच समन्वय जैसा गुण हम क्यों नहीं सीख पाते? भक्ति हमें अंधश्रद्धा तो नहीं सिखाती है! कृष्ण की महत्ता और उनके प्रति भक्ति-भावनाएं शाश्वत बनी रहीं, क्योंकि उन्होंने न केवल तत्कालीन मानव जाति का कल्याण किया, अपितु लोक-कल्याण की अनुकरणीय परम्पराओं का शुभारम्भ भी किया। चिर प्राचीन भारतीय परम्परा में श्रीकृष्ण के योगदान, महत्त्व, जीवनदर्शन, गीताज्ञान, शिक्षाओं उपदेशों आदि का चिन्तन-मनन करते हुए विभिन्न महत्त्वपूर्ण एवं प्रेरक अवसरों पर उनके द्वारा किए गए उपदेशों, सन्देशों, विचारों तथा आचरण की शिक्षा लेनी चाहिए। महामानव इतिहास पुरुष योगेश्वर श्रीकृष्ण की स्मृति को कोटि-कोटि प्रणाम्।









