भगवान महावीर का जन्म किसी अवतार का पृथ्वी पर शरीर धारण करना नहीं है, नारायण का नर शरीर धारण करना नहीं है, नर का ही नारायण हो जाना है। साधना की सिद्धि परमशक्ति का अवतार बनकर जन्म लेने में अथवा साधना के बाद परमात्मा में विलीन हो जाने में नहीं है, बहिरात्मा के अन्तरात्मा की प्रक्रिया से गुजरकर स्वयं परमात्मा हो जाने में है। महावीर मानव ही नहीं महामानव थे। उन्होंने हिंसा से पूरी तरह विरत रहने की बात कही। सादगी और ब्रह्मचर्य के मार्ग को सर्वोत्तम बताया। आज विश्व में भगवान महावीर के उपदेशों की प्रासंगिकता बढ़ गई है।
भगवान महावीर की जयंती को हम जन्म कल्याणक कहते हैं। जन्म, जयंती जैसे शब्द जैन परंपरा में प्रयोग नहीं किए जाते हैं। भगवान का जन्म पूरे विश्व के कल्याण के लिए हुआ है। महावीर स्वामी द्वारा दिए गये उपदेश हो या श्लोक, पत्थर पर खुदे आलेख हों या चित्रित मुद्राएँ, पवित्र मंत्र हो या भावपूर्ण भजन जैन अनुयायियों के लिए तो महत्वपूर्ण है ही साथ-साथ उनके जीवन जीने के सिद्धांत भी है। वे सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, दान, सेवा, पूजन, व्रत, साधना, प्रार्थना आदि का अनुसरण करते हुए जीवन यापन करते हैं और बड़ी धूम से जयंती मनाते हैं। कहा जाता है, कि भगवान महावीर बिहार प्रदेश के ग्राम कुण्डला के राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के पुत्र थे। जिन्होंने 30 वर्ष की अवस्था तक राजसी एवं सांसारिक जीवन यापन किया तत्पश्चात् आध्यात्मिक स्वतंत्रता और जीवन के सच्चे लक्ष्य की खोज में अपने सिंहासन और परिवार का त्याग करके तपस्वी बन गए और 72 वर्ष की आयु में निर्वाण प्राप्त किया।
विचारणीय प्रश्न यह है कि वर्तमान समय में भगवान महावीर के सिद्धान्त कहाँ तक उपयोगी है? क्या आज भी उन्हीं सिद्धांतों के आधार पर व्यक्ति अपना जीवन सुखमय बना सकता है? जवाब में मतभेद मिलेंगे क्यूँकि आदर्शवादिता हाँ कहलवायेगी और अवसरवादिता ना। वस्तुतः महावीरजी के समस्त सिद्धान्त, मानव विकास एवं कल्याण में सदैव पथ-प्रदर्शन करते रहेंगे। बल्कि ऐसा लगता है कि पर्यावरण प्रदूषण और ग्लोबल वाॅर्मिंग के दौर में भगवान महावीर की प्रासंगिकता ओर बढ़ गई है, इसलिए तो भगवान महावीर को पर्यावरण पुरुष और अहिंसा विज्ञान को पर्यावरण का विज्ञान कहा जाता है।
जिस समय महावीर का आविर्भाव हुआ, उस समय देश विषम परिस्थिति से गुजर रहा था। धर्म के नाम पर, नर एवं पशुओं की बलि दी जाती थी। स्त्री और शूद्र जाति को शास्त्र पढ़ने का अधिकार नहीं था। जातिवाद प्रभावी था। धर्म गुणात्मक न रहकर व्यक्तिपूजक एवं व्यर्थ के कर्मकाण्डों से विकृत होता जा रहा था। मानवीय दास प्रथा प्रचलित थी। ऐसे विचित्र वातावरण के बीच भगवान महावीर ने कुण्डलपुर में राजा सिद्धार्थ के घर में माता त्रिशला रानी के गर्भ से जन्म लिया। सुख-सुविधाओं एवं ऐश्वर्य की कोई कमी नहीं होने पर भी महावीर ने अपने अन्तर्मन में वेदना और रिक्तता का अनुभव किया। इसी कारण आपने सब कुछ त्याग कर पूर्ण साधनामय जीवन स्वीकार कर लिया और साढ़े बारह वर्ष की कठोर साधना से केवल्य ज्ञान की प्राप्ति की। महावीर ने ‘‘अहिसा’’ और पृथ्वी के सभी जीवों पर दया रखने का संदेश दिया। ‘‘जीओ और जीने दो’’ जैन पंथ के मूलमंत्र है। इस एक मंत्र से, विश्व की सभी समस्याओं का निराकरण हो सकता है और सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक भेदभाव और शोषण से मुक्ति मिल सकती है। जैन धर्म में अहिसा, कायरों का नहीं वरन् वीरों का भूषण है। ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’’ की मंगल भावना, अहिसा के अमूल्य विचार है, जो विश्व में शाँति एवम् सद्भाव स्थापित कर सकते हैं।
भगवान महावीर के विचार कालजयी हैं, वे सदैव प्रासंगिक बने रहेंगे। जीवन जीने का जो संदेश भगवान महावीर ने संसार को दिया है यदि उस तरह से अखिल विश्व जीवन जीना शुरू कर दे तो शांति, सदाचार, सौहार्द्र, संपन्नता और चारों ओर आनंद ही आनंद हो जाएगा। कोई किसी का दुश्मन नहीं रहेगा। विश्व में कहीं भी कभी युद्ध नहीं होगा। सभी मिल जुल कर रहेंगे। दुनिया आज संवेदनहीन हो चली है, लोग तनाव भरा जीवन जी रहे हैं। भगवान महावीर ने उस समय ही कह दिया था कि अपरिग्रही बनो अर्थात् एक मर्यादा में रह कर ही पुण्य व पुरुषार्थ के बल पर पर्याप्त मात्रा में जो धन आपको मिले, उससे ही खुशी खुशी अपने जीवन का निर्वाह करो। इससे आप सदा आनंदित भी रहोगे और तनाव भी नहीं होगा। भगवान महावीर ने विषयुक्त आहार का सेवन करने की मनाही की है। आॅर्गेनिक खेती का ही अन्न सेवन करने के योग्य है। अहिंसा का संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि किसी जीव के साथ हिंसा मत करो। इसलिए भगवान महावीर के जन्म कल्याणक के शुभ अवसर पर मानवता के लिए यही संदेश है कि स्वस्थ, निरोगी, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के साथ प्रेमपूर्वक जीवन जीना चाहते हो तो भगवान महावीर के बताए रास्तों पर चलो। भगवान महावीर के विचारों को व्यवहार में लाने में जगत का कल्याण निहित है।
महावीर ने माँसाहार का निषेध कर, शाकाहार को हर दृष्टि से लाभप्रद बताया। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो भी, माँसाहार शरीर एवं मन दोनों के लिए प्राण घातक है और मनुष्य में हिंसक प्रवृति को जन्म देता है। उच्च रक्त-चाप, मधुमेह, हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियाँ विकसित होती है। महात्मा गांधी, महर्षि अरविन्द, विनोबा भावे जैसे महान् व्यक्ति भी महावीर के सिद्धांतों से अत्यधिक प्रभावित थे। प्रसिद्ध दार्शनिक, जार्ज बर्नाड शाँ पक्के शाकाहारी थे। उनका कहना था, मेरा पेट, पेट है, कोई कब्रिस्तान नहीं, जहाँ मुर्दों को स्थान दिया जाय। अपनी अंतिम इच्छा व्यक्त करते हुए, उन्होंने कहा, यदि मेरा पुर्नजन्म हो, तो भारत में हो और जैन कुल में हो।
‘‘सत्य’’ महावीर द्वारा बताया गया महत्वपूर्ण सूत्र है। प्रत्येक व्यक्ति का चिंतन, मनन और विचार सत्य पर आधारित होने चाहिए। सत्य ही मानव को जीव से शिव, नर से नारायण, आत्मा से परमात्मा बनने की शक्ति देता है। आज मनुष्य के स्वभाव में, व्यवहार में, बोलचाल में, कार्यशैली में झूठ का स्थान है। राजनीतिज्ञ, शासक, व्यापारी सभी वास्तविकता से हटकर, असत्य के सहारे, अपने स्वार्थ पूर्ति में लगे हैं और देश को गर्त में धकेल रहे हैं। सत्य जो हमारा स्वाभाविक एवं सहज गुण है, जो स्वतः ही प्रस्फुटित होता है, उसे हम त्याग रहे हैं। महावीर के विचार में, सत्य एवं अहिंसा से कोई राष्ट्र शांति एवं निर्भयता से प्रत्येक समस्या का समाधान कर सकता है।
महावीर का अनेकांतवाद अथवा स्यादवाद का सिद्धांत भी सत्य पर आधारित है। महावीर ने कहा था, किसी भी वस्तु या घटना को एक नहीं वरन् अनंत दृष्टिकोणों से देखने की आवश्यकता है। आज समाज में झगड़े, विवाद आदि एकांगी दृष्टिकोण को लेकर होते हैं। यदि विवाद के समस्त पहलुओं को समझा जाए, मिथ्या अंशों को छोड़, सत्याशों को पकड़ा जाय तो सम्भवतः संघर्ष कम हो जाय। वैज्ञानिक आईस्टीन का सापेक्षवाद महावीर के अनेकान्तवाद पर ही टिका है।
आज के युग में, मनुष्य को सबसे अधिक आवश्यकता है, महावीर के अपरिग्रह के सिद्धांतों को समझने की। संग्रह अशांति का अग्रदूत है। विनाश, विषमता तथा अनेक समस्याओं को जन्म देता है। कार्ल माक्र्स का साम्यवाद भी इस रोग की दवा नहीं, क्योंकि हिंसा से हिंसा शाँत नहीं होती। महावीर का अपरिग्रह का विचार ही, इसकी संजीवनी है जो अमीर गरीब की दूरी कम कर सामाजिक समता स्थापित कर सकती है।
महावीर के उपदेशों में यदि अचैर्य के सिद्धान्त का अनुकरण किया जाए तो, आज विश्व में व्याप्त भ्रष्टाचार व काले धन पर अंकुश लगाया जा सकता है। महावीर ने स्त्रियों को पूर्णतः स्वतंत्र और स्वावलम्बी बताया। आज स्त्रियों के समान अधिकार एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता हेतु महावीर के विचार आज भी सार्थक है। महावीर द्वारा बताये सूत्रों में एक महत्वपूर्ण सूत्र ब्रह्मचर्य है। आज के भोगवादी पाश्चात्य प्रेरित युग में इससे बढ़कर कोई त्याग-संयम नहीं। इससे बढ़ती जनसंख्या के दुष्प्रभावों से बच सकेंगे। निर्धनता, बेरोजगारी, भिक्षावृत्ति, आवास, निवास, अपराध, बाल अपराध आदि समस्याओं का निराकरण होगा तथा एड्स जैसी महामारी को विश्व में विकराल रूप धारण करने से रोक पाएँगे।
महावीर ने तन-मन की शुद्धि तथा आत्म बल बढ़ाने हेतु साधना एवं तपश्चर्या पर बल दिया। आज के भौतिकवादी युग में जहाँ खानपान की अशुद्धता एवं अनियमितता है और जीवन तनावयुक्त है, महावीर द्वारा बताई तप, त्याग एवं साधनामय जीवन-शैली ही समस्याओं का समाधान है।
महावीर के सिद्धांत न केवल सामाजिक, आत्मिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में वरन राजनीति क्षेत्र में भी अत्यधिक सार्थक एवं प्रासंगिक है। महावीर का ‘‘अहिंसा’’ का दिव्य संदेश, स्वार्थ प्रवृति एवं संकीर्ण मनोवृति को विराम दे सकता है, चुनावी हिंसा और आंतक के तांडव नृत्य को रोक सकता है। ‘‘सत्य’’ का आचरण घोटालों में लिप्त राजनेताओं एवं नौकरशाहों को राष्ट्रहित की प्रेरणा दे सकता है। ‘‘अचैर्य’’ और ‘‘अपरिग्रह’’ का संदेश, भ्रष्टाचार एवं कालाबाजारी को रोक, सामाजिक विषमता को कम कर सकता है। ‘‘जीओ एवं जीने दो’’ का सिद्धांत आपसी बैरभाव और कटुता को कम कर सकता है। महावीर के अनेकान्तवाद के सच्चे प्रयोग से चुनाव में व्याप्त साम्प्रदायिकता एवं कट्टरता के भूत को भगाया जा सकता है।
महावीर के सिद्धांत किसी विशिष्ट समाज, विशेष समय या परिस्थिति के लिए नहीं थे वरन् सार्वभौमिक थे। महावीर के सिद्धान्तों की धवल ज्योत्स्ना ही विश्व कल्याण कर सकती है। महावीर का दर्शन सभी के लिये जीवन्त दर्शन है। इसके अभाव में ज्ञानी का ज्ञान, पंडित का पांडित्य, विद्वान की विद्वता, भक्तों की भक्ति, अहिंसकों की अहिंसा, न्यायाधीश का न्याय, राजनेताओं की राजनीति, चिन्तकों का चिन्तन और कवि का काव्य अधूरा है। महावीर के दर्शन में अहिंसा, अनेकान्त, अपरिग्रह का समग्र दर्शन है जो शाश्वत सत्य की आधारशीला पर प्रारूपित किया गया है।
दिलावर सिंह










