समुत्कर्ष समिति द्वारा ‘‘तस्मै श्री गुरुवे नमः’’ विषय पर 76 वीं समुत्कर्ष विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। ऑनलाइन गोष्ठी में अपने विचार रखते हुए वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि गुरु के बिना मनुष्य का जीवन अज्ञान के अंधेरे में खो जाता है। वह गुरु ही है जो किसी भी मनुष्य को अज्ञान रूपी अंधकार से बाहर निकालकर ज्ञान के प्रकाश की और ले जाता है। गुरु का मार्गदर्शन ही किसी व्यक्ति को सुसंस्कृत एवं महान बनाता है। हमारी संस्कृति में युगों-युगों से गुरु की महिमा का बखान किया जाता रहा है। गुरु के सम्मान में ही आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता हैै।
विषय का प्रवर्तन करते हुए समुत्कर्ष पत्रिका के सम्पादन मंडल सदस्य व बाल साहित्यकार तरुण कुमार दाधीच ने कहा कि गुरु तो पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह हैं जो पूर्ण प्रकाशमान हैं और शिष्य आषाढ़ के बादलों की तरह। आषाढ़ में चंद्रमा बादलों से घिरा रहता है जैसे बादल रूपी शिष्यों से गुरु घिरे हों। शिष्य सब तरह के हो सकते हैं, जन्मों के अंधेरे को लेकर आ छाए हैं, वे अंधेरे बादल की तरह ही हैं। उसमें भी गुरु चांद की तरह चमक सके, उस अंधेरे से घिरे वातावरण में भी प्रकाश जगा सके, तो ही गुरु पद की श्रेष्ठता है। इसलिए आषाढ़ की पूर्णिमा का महत्व है!
अपनी बात रखते हुए समुत्कर्ष पत्रिका के सम्पादक वैद्य रामेश्वर प्रसाद शर्मा ने कहा कि अपने धर्म में गुरुओं को सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। यहाँ तक कि गुरुओं को भगवान से भी ऊपर का दर्जा प्राप्त हैं क्योंकि गुरु ही हमें अज्ञानता के अंधेरे से सही मार्ग की ओर ले जाता है। गुरु को गुरु इसलिए कहा जाता है कि वह अज्ञान तिमिर का ज्ञानांजन-शलाका से निवारण कर देता है। सनातन परंपरा में गुरु का नाम ईश्वर से पहले आता है क्योंकि गुरु ही होता है जो आपको गोविंद से साक्षात्कार करवाता है, उसके मायने बतलाता है।
इस अवसर पर संदीप आमेटा ने बताया कि गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन महाभारत के रचयिता महर्षि वेद व्यास जी का अवतरण हुआ था। सनातन संस्कृति के अठारह पुराणों के रचयिता महर्षि वेदव्यास को माना जाता है। उन्होंने ने ही वेदों की रचना की थी। इस कारण उनका नाम वेद व्यास पड़ा था। महर्षि वेद व्यास को आदि गुरु भी कहा जाता है।
विकास दवे ने कहा कि हिन्दू धर्म में गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि गुरु ही हैं जो इस संसार रूपी भव सागर को पार करने में सहायता करते हैं। गुरु के ज्ञान और दिखाए गए मार्ग पर चलकर व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त करता है। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि ईश्वर आपको श्राप दें तो इससे गुरु आपकी रक्षा कर सकते हैं परंतु गुरु के दिए श्राप से स्वयं ईश्वर भी आपको नहीं बचा सकते हैं।
इस अवसर पर अनिल गोधा, हरिदत्त शर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त किए। समुत्कर्ष पत्रिका के उपसंपादक गोविन्द शर्मा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए आभार प्रदर्शन किया।
इस ऑनलाइन गोष्ठी में विद्यासागर, लोकेश जोशी, कविता शर्मा, प्रतिमा सामर, चिराग सैनानी, चंद्रकांता अग्रवाल, विनोद भट्ट, गोपाल लाल माली भी सम्मिलित हुए।
शिवशंकर खण्डेलवाल










