विधि:- यह मुद्रा दो प्रकार से बनाई जा सकती है।
प्रकार 1:- पहले पृथ्वी मुद्रा बनाएँ अर्थात् दोनों हाथों की अनामिका अँगुली को अँगूठें से मिलाएँ और आपस में मिला लें। इसके बाद कनिष्ठा (सबसे छोटी) अँगुलियों के सिरों को भी मिला लें। शेष दोनों अँगुलियां सीधी रखें।
प्रकार 2:- दोनों हाथों से इन्द्र मुद्रा बनाकर आपस में मिला लें अर्थात् कनिष्ठा को अँगूठे से मिलाकर आपस में मिलाएं उसके बाद दोनों हाथों की अनामिका अँगुलियों को भी आपस में मिला लें। शेष दोनों अँगुलियों को सीधा रखना है।
अवधि:- यह मुद्रा 5 से 7 मिनट तक दिन में तीन बार करनी है।
लाभ:-
- इस मुद्रा से नाभि से नीचे के भाग अर्थात पुरुषों की पौरुष ग्रंथि, मूत्राशय, महिलाओं के प्रजनन अंगों के रोगों में विशेष लाभ रहता है।
- मासिक धर्म के समय में होने वाली तीव्र वेदना समाप्त होती है।
- मूत्र सम्बन्धी विकार एवं पौरुष ग्रंथि ;च्तवेजंजम ळसंदकद्ध से सम्बंधी विकार दूर होते हैं।
- इससे कब्ज समाप्त करने में भी लाभ मिलता है। जिसका परिणाम बवासीर ;च्पसमेद्ध ठीक करने में भी होता है।
- हर्निया में भी यह मुद्रा लाभदायक है।
श्रीवर्धन











