वर्तमान में आदिवासियों, वनवासियों और दलितों के बीच जो धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा, रीति और रिवाज हैं, वे सभी प्रभु श्रीराम की ही देन हैं। भगवान राम भी वनवासी ही थे। उन्होंने वन में रहकर संपूर्ण समाज को एक-दूसरे से जोड़ा और उनको सभ्य एवं धार्मिक तरीके से रहना सिखाया। बदले में प्रभु श्रीराम को जो प्यार मिला, वह सर्वविदित है।
दादा’ के स्वाध्याय आंदोलन में समाज सुधार की जबरदस्त शक्ति देखने को मिलती है। कितने ही लोगों ने मद्यपान छोड़ दिया, जुआ खेलना बंद कर दिया, इससे घर परिवार में पत्नियों को प्रताड़ित करना भी रुका। छोटे-मोटे अपराधों में लिप्त लोग सामुदायिक बेहतरी के कामों में रुचि लेने लगे। पाण्डुरंग शास्त्री आठवले (दादा) के इस आंदोलन ने एक मनोहारी दृश्य साकार कर दिया और यह दैनिक संस्कृति बन गई। स्थानीय मछुआरे संस्कृति के श्लोक गाते हुए काम पर जाते तथा जितनी भी मछलियाँ मिलतीं, उसमें से गरीबों का अंश निकाल कर बाँट देते। उनके लिए उनकी नावें मंदिर की संज्ञा पा गईं। गाँव वालों ने बड़े विस्तार में वृक्षारोपण किया और उन वृक्षों को ‘मंदिर वृक्ष’ कहा गया। इससे बंजर धरती कुछ समय में हरियाली से भर गई।
‘दादा’ के स्वाध्याय व्यवहार से गाँवों की संस्कृति बदलने लगी। गाँवों में सफाई की चेतना आई। परिवारों के बीच पास-पड़ोस तक में सद्भावना का पुनर्संचार हुआ। बच्चे प्रसन्नचित स्कूल जाने लगे। गाँवों में अस्पृश्यता जैसी भावना खत्म होने लगी और उसकी उपज जरूरतमंदों को दिए जाने के लिए रखी गई। यहाँ तक कि विभिन्न धर्मों के पूजा स्थल एक स्थान पर आ गए। पाण्डुरंग शास्त्री आठवले ने गाँव-गाँव में जाकर यह संदेश दिया कि स्वाध्याय का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। इसे दुनिया की मुश्किलें हल करने की चाबी नहीं समझा जाना चाहिए, स्वाध्याय के जरिए तो हम बस, प्रेम, पारम्परिक शांति तथा निस्वार्थ भाव की संस्कृति फैला रहे हैं। दादा ईश्वर को सर्वविद्यमान होने का संदेश देते थे तथा आध्यात्मिक एकता उनका अभीष्ट था। वे पुरातन कालीन हिंदू ज्ञान सम्पदा की बात तथा उसका महत्त्व उसी श्रद्धा से बताते थे, जिससे वे पाश्चात्य विचारकों का जिक्र करते थे। वह अपने श्रोताओं को खुद से मुक्त करने की प्रेरणा देते थे। वे कहते थे, स्वबंधन जरा जटिल है।
भारत में रहने वाला हर व्यक्ति आदिवासी है।
शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का कहना है कि आदिवासी कोई अलग धर्म या जाति नहीं है, वे हिन्दुओं के ही अभिन्न अंग हैं। शंकराचार्य ने कहा कि हिन्दुओं को बाँटने और भारत को कमजोर करने के लिए आदिवासी शब्द देकर भ्रम फैलाया गया। ये आदिवासी नहीं, वनवासी हैं। वनों में रहने के कारण इनकी जीवन शैली में बदलाव नहीं हुआ, जबकि अन्य के शहरों में बस जाने के कारण उनमें बदलाव होता गया।
भारत के आदिवासियों का धर्म क्या है इस संबंध में कई तरह के भ्रम पैदा किए जाते हैं। यह भ्रम 300 वर्षों से जारी आधुनिक काल की राजनीति के चलते हैं। लेकिन सच्चाई ये हैं कि भारत के आदिवासियों का मूल धर्म शैव है।मूल रूप से ये शिव एवं भैरव के साथ ही प्रकृति पूजक हैं और जंगल, पहाड़, नदियों एवं सूर्य की आराधना करते हैं। इनके अपने अलग लोक देवता, ग्राम देवता और कुल देवता हैं। जैसे नागवंशी आदिवासी और उनकी उप जनजातियाँ नाग की पूजा करते हैं। सिंधु घाटी की सभ्यता में शिव जैसी पशुओं से घिरी जो मूर्ति मिली है इससे यह सिद्ध होता है कि आदिवासियों का संबंध सिंधु घाटी की सभ्यता से भी था।
शंकराचार्य ने कहा कि आदिवासी और हिन्दुओं की सबसे बड़ी समानता विवाह पद्धति और पूजा है, जो किसी अन्य धर्म से मेल नहीं खाता। आदिवासी अपने गोत्र में शादी नहीं करते, हिन्दू भी अपने गोत्र में शादी नहीं करते। जबकि दूसरे धर्म में विवाह के लिए गोत्र नहीं देखा जाता। शंकराचार्य ने कहा कि आदिवासी प्रकृति के पुजारी होते हैं। पिता और माता को देवता मान कर पत्थर गाड़ते हैं। हिन्दू भी माँ-पिता को देवता मानते हैं। जबकि दूसरे धर्म में तो मनुष्य को देवता माना ही नहीं जाता। शंकराचार्य ने कहा कि वनवासियों के पास देव शब्द ही धर्म है, जो हिन्दुओं से मिलता है। उरांव, मुंडारी, गौंड आदिवासियों में राम-कृष्ण के भजन लिखे और भक्तिपूर्वक गाए जाते हैं।
भारत में रहने वाला हर व्यक्ति आदिवासी है लेकिन चूंकि विकास क्रम में भारतीय वनों में रहने वाले आदिवासियों ने अपनी शुद्धता बनाए रखी और वे जंगलों के वातावरण में खुले में ही रहते आए हैं तो उनकी शारीरिक संरचना, रंग-रूप, परंपरा और रीति रिवाज में कोई खास बदलावा नहीं हुआ। हालाँकि जो आदिवासी अब गाँव, कस्बे और शहरों घरों में रहने लगे हैं उनमें धीरे धीरे बदलाव जरूर आए लेकिन सभी के डीएनए एक ही हैं। भारत में लगभग 461 जनजातियाँ हैं। उक्त सभी आदिवासियों का मूल धर्म शैव हिन्दू है, लेकिन धर्मांतरण के चलते अब ये ईसाई, मुस्लिम और बौद्ध भी हो चले हैं।इसलिए केंद्र सरकार को आदिवासियों की परंपरा और संस्कृति की रक्षा करने के लिए सरना धर्म कोड बिल अविलंब लागू कर देना चाहिए। नहीं तो आदिवासियों का धर्मांतरण होता रहेगा और आदिवासियों की परंपरा और संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी।









