श्रीराम मन्दिर का शिलान्यास स्वयं की पहचान एवं अस्मिता को जीवंतता देने का अवसर है। जो हमें फिर से अपनी जड़ों को मजबूती देने के लिये सोचने का धरातल दे रहा है कि कथित धर्म निरपेक्षता की अवधारणा के जोश में हम अपने अतीत को अनदेखा नहीं करें, अपने गौरवमय अतीत को धुंधला न होने दें। यह मन्दिर धर्म की स्थापना एवं बुराइयों से संघर्ष का प्रतीक बनेगा, जरूरत है अंधेरों से संघर्ष करने के लिये इस प्रेरक एवं प्रेरणादायी मन्दिर की संस्कृति एवं आस्था को जीवंत बनाने की।
भगवान श्रीराम अविनाशी परमात्मा हैं, जो सबके सृजनहार व पालनहार हैं। वस्तुतः श्रीराम के लोकनायक चरित्र ने जाति, धर्म और संप्रदाय की संकीर्ण सीमाओं को लांघ कर जन-जन को अनुप्राणित किया। भारत में ही नहीं, दुनिया में श्रीराम परम पूजनीय हैं और आदर्श हैं। थाईलैंड, इंडोनेशिया आदि कई देशों में भी श्रीराम आदर्श के रूप में पूजे जाते हैं। रामायण में जो मानवीय मूल्य दृष्टि सामने आई, वह देशकाल की सीमाओं से ऊपर उठ गई। वह उन तत्वों को प्रतिष्ठित करती है, जो केवल पढ़े-लिखे लोगों के रंजन की चीज न रहकर लोक मानस का अंग बन गई।
इंडोनेशिया जैसे मुस्लिम राष्ट्र में नागरिक रामलीला का मंचन करते हैं तो क्या वे अपने धर्म से भ्रष्ट हो जाते हैं? इस मुस्लिम देश में रामलीलाओं का मंचन भारत से कहीं बेहतर और शास्त्रीय कलात्मकता, उच्च धार्मिक आस्था के साथ किया जाता है। ऐसा इसलिये संभव हुआ है कि श्रीराम मानवीय आत्मा की विजय के प्रतीक महापुरुष हैं, जिन्होंने धर्म एवं सत्य की स्थापना करने के लिये अधर्म एवं अत्याचार को ललकारा। इस तरह वे अंधेरों में उजालों, असत्य पर सत्य, बुराई पर अच्छाई के प्रतीक बने।
आजाद भारत में संकीर्ण मानसिकता, तथाकथित धर्मनिरपेक्षता, घृणा, उन्माद, कट्टरवाद और साम्प्रदायिकता राजनीति के आधार बने एवं इस तरह की राष्ट्र एवं समाज तोड़क तत्वों से सत्ताएँ बनती एवं बिगड़ती रही है। इस तरह की घृणित एवं तथाकथित राजनीति की जड़ें गहरी न होती तो श्रीराम मंदिर निर्माण कब का हो गया होता। अब जबकि श्रीराम मंदिर निर्माण होने जा रहा है तो हमें गर्व भी हो रहा है और इस तरह का आभास भी हो रहा है कि अब समाज एवं राष्ट्र को तोड़ने वाली ताकतों का वर्चस्व समाप्त होगा, राजनीति में भी स्वस्थ मूल्यों को बल मिलेगा।
बहुत कठिन है धर्म की स्थापना का यह अभियान एवं तेजस्विता की यह साधना। क्योंकि हम कैसे संघर्ष करें घर में छिपी बुराइयों से, जब घर आंगन में रावण-ही-रावण पैदा हो रहे हों। हमें भगवान श्रीराम को अपना जीवन-आदर्श बनाना ही होगा, उनके साहस, संयम एवं मर्यादा के मूल्यों को जीवनशैली बनाना ही होगा। तभी श्रीराम मंदिर जीवनमूल्यों की महक एवं प्रयोगशाला के रूप में उभरेगा। क्योंकि श्रीराम का चरित्र ही ऐसा है, जिससे न केवल भारत बल्कि विश्व में शांति, अहिंसा, साम्प्रदायिक सौहार्द एवं समृद्धि का साम्राज्य स्थापित होगा।
श्रीराम रघुकुल में जन्मे थे, जिसकी परम्परा ‘प्रान जाहुं परु बचनु न जाई’ की थी। श्रीराम हमारी अनंत मर्यादाओं के प्रतीक पुरुष हैं इसलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम से पुकारा जाता है। हमारी संस्कृति में ऐसा कोई दूसरा चरित्र नहीं है जो श्रीराम के समान मर्यादित, धीर-वीर, न्यायप्रिय और प्रशांत हो। वाल्मीकि के श्रीराम लौकिक जीवन की मर्यादाओं का निर्वाह करने वाले वीर पुरुष हैं। उन्होंने लोक धर्म की पुनः स्थापना की। वे दुराचारियों, यज्ञ विध्वंसक राक्षसों, अत्याचारियों का नाश कर लौकिक मर्यादाओं की स्थापना करके आदर्श समाज की संरचना के लिए ही जन्म लेते हैं। आज ऐसे ही स्वस्थ समाज निर्माण की जरूरत है।
यदि किसी राष्ट्र की धरती अथवा राजसत्ता उससे छिन जाये तो शौर्य से उसे वापस हासिल किया जा सकता है। यदि धन नष्ट हो जाए तो परिश्रम से कमाया जा सकता है, परन्तु यदि राष्ट्र अपनी पहचान ही खो दे तो कोई भी शौर्य या परिश्रम उसे वापस नहीं ला सकता। हमारे राष्ट्र की पहचान को धुंधलाने के अनेक षड्यंत्र एवं कथित दमनकारी इरादे हावी होते रहे हैं, लेकिन हमारी एकता एवं संस्कृति के प्रति आस्था ने उनके नापाक इरादों को कभी सफल नहीं होने दिया। क्योंकि भारत की संस्कृति एवं संस्कारों में दो अक्षरों का एक राम-नाम गहरा पैठा एवं समाया हुआ है, उसके बल पर हम हर बाधा को पार कर सकते हैं।
असली मन्दिर की प्राण-प्रतिष्ठा तभी होगी जब आसेतु-हिमाचल हिन्दू समाज कुरीतियों-रूढ़ियों-विकृतियों से मुक्त होगा, आडम्बर एवं प्रदर्शन मुक्त होकर समतामूलक समाज की स्थापना करेगा। भारत अपने आत्म-सम्मान एवं शक्ति को हासिल करते हुए सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं बौद्धिक-आर्थिक स्तर पर विश्व गुरु की भूमिका का निर्वाह करेगा। हमें शांतिप्रिय होने के साथ-साथ शक्तिशाली बनकर उभरना होगा, ताकि फिर कोई आक्रांता हमें कुचले नहीं, हम पर शासन करने का दुस्साहस न कर सकें।
वस्तुतः श्रीराम मन्दिर बनना रामराज्य की परिकल्पना को साकार रूप देने का सशक्त माध्यम बनेगा।









